महिला को सलाम! विकलांगता की वजह से नहीं दिया था एडमिशन, आज उसी स्कूल में पढ़ाई जाती हैं उनकी लिखी हुई किताबें

पीयूष शर्मा/मुरादाबाद: ‘सलाम है कंचन खन्ना के हौसले को’ शारीरिक कमजोरी की वजह से शहर के सभी पब्लिक स्कूलों ने उन्हें अपने यहां प्रवेश देने से मना कर दिया था. मगर इसके बाद भी इस बेटी ने हिम्मत नहीं हारी, अपने मजबूत इरादों और दृढ़ इच्छा शक्ति की बदौलत कुछ ऐसा कर दिखाया कि आज हजारों बेटियां उन्हें अपना प्रेरणा स्रोत मानकर आगे बढ़ रही हैं.

मुरादाबाद के लाइन पर आदर्श नगर की रहने वाली कंचन खन्ना के अंदर कुछ कर दिखाने का हौसला आज भी बरकरार है. कंचन खन्ना बचपन से ही दिव्यांग है. वह ठीक से बैठ भी नहीं पाती है. अपना करियर बनाने के लिए उन्हें बहुत संघर्ष करना पड़ा. प्राइमरी शिक्षा के लिए परिवार वालों ने उन्हें लेकर शहर के सभी स्कूल कॉलेज के चक्कर काटे. मगर किसी भी स्कूल में उनकी शारीरिक अक्षमता के कारण दाखिला नहीं दिया. तभी कंचन ने मन में कुछ ऐसा करने का ठान ली, जिसमें लोगों उन्हें सम्मान की नजरों से देखें. इसके लिए कंचन ने घर पर ही पढ़ाई शुरू कर दी.

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उनकी लिखी हुई पढ़ाई जा रही किताबें
उन्होंने अंग्रेजी से एमए किया. इतना ही नहीं अंग्रेजी व्याकरण की पांच किताबें भी लिख चुकी हैं. इसके अलावा उनका एक काव्य संग्रह भी प्रकाशित हो चुका है. इस दौरान उन्होंने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया. इसके साथ ही रुद्रपुर में एक कंप्यूटर सेंटर भी खोला, मगर कोरोना काल में उसे बंद करना पड़ा. शहर की यह बेटी सामाजिक कार्य में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं. कई सम्मान भी पा चुकी हैं. आज उन पब्लिक स्कूलों में कंचन की लिखी इंग्लिश ग्रामर की किताब पढ़ाई जा रही है. जिन्होंने कभी उन्हें अपने यहां पढ़ने से मना कर दिया था. ट्यूशन से हजारों बच्चों को जिंदगी में शिक्षा की अलख जगाने वाली कंचन खन्ना अन्य बेटियों के लिए प्रेरणा स्रोत बनी है.

7 से 8 पुस्तक लिख चुकी है कंचन खन्ना
कंचन खन्ना ने बताया कि मैं मुख्य रूप से ट्यूशन पढ़ाती हूं इसके साथ ही मेरी लेखन में भी रुचि है. इसलिए मैं कविताएं ग्रामर की बुक्स आदि चीज भी लिखती रहती हूं. अपने जीवन में मैंने अब तक 7 से 8 पुस्तक लिख दी हैं. जिसमें दो काव्य संग्रह आए हैं. इसके साथ ही तीन ग्रामर की बुक हैं. इसके साथ ही मैं हाई स्कूल से ऊपर कक्षा के बच्चों को ट्यूशन पढ़ती हूं. जिसमें इंग्लिश मेरा मेन सब्जेक्ट रहता है. क्योंकि मैंने इंग्लिश से ही एमए की पढ़ाई कंप्लीट की है. उन्होंने कहा कि व्यक्ति को यह मन में नहीं ठान लेना चाहिए कि हम कुछ नहीं कर सकते. उन्हें अपना मन बना लेना चाहिए कि भले ही हम दिव्यांग हैं. तो क्या हुआ जो करना चाहेंगे वह अवश्य ही पूरा होगा.

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