नई दिल्ली. भारत में क्रिकेट को धर्म का सा दर्जा हासिल है. क्रिकेट का ईजाद भले इंग्लैंड में हुआ हो लेकिन यह खेल हमारे देश की सांसों में रचा-बसा है. वैसे तो कई प्लेयर्स ने अपने प्रदर्शन से दिलों पर राज किया लेकिन इनमें से कुछ की पॉपुलरिटी इस कदर थी कि उनका टीम से बाहर होना फैंस को बर्दाश्त नहीं था. ये क्रिकेटर ऐसे थे जिन्होंने अपने खेल कौशल से मुल्क को जीतें दिलाने के साथ अपनी बैटिंग से लोगों को खूब एंटरटेन किया. आलम यह था कि जब कुछ कारणों ने इन्हें टीम से बाहर किया गया तो विरोध प्रदर्शन हुए और मैच आयोजित न होने देने और इसके बायकॉट की भी धमकी दी गई.
इन तीन प्लेयर्स में मुश्ताक अली, सलीम दुर्रानी और कपिल देव थे. भारत ने कपिल देव की ही कप्तानी में पहली बार 1983 में क्रिकेट वर्ल्ड कप जीता था. उन्हें देश का अब तक का सबसे महान हरफनमौला माना जाता है.
मुश्ताक को दर्शकों की डिमांड पर देनी पड़ी थी टीम में जगह
1934 से 1952 तक इंटरनेशनल क्रिकेट खेले कैप्टन मुश्ताक अली के व्यक्तित्व और खेल में गजब की चमक थी. 17 दिसंबर 1914 को इंदौर में जन्मे मुश्ताक ने भले ही केवल टेस्ट क्रिकेट खेला लेकिन उनकी बैटिंग में वनडे और टी20 शैली का मजा था. मुश्ताक मौजूदा दौर के क्रिकेटरों की तरह इनोवेटिव शॉट खेलने में माहिर थे. होल्कर टीम के महान खिलाड़ी मुश्ताक ऑफ स्टंप की गेंद को लेग साइड में बाउंड्री लाइन के बाहर भेज सकते थे. टेस्ट क्रिकेट में कई बार उन्होंने विजय मर्चेंट के साथ पारी की शुरुआत की. खेल शैली के लिहाज से यह दोनों बैटर एकदम विपरीत थे. कॉपीबुक शैली के बैटर मर्चेंट जहां विकेट पर लंगर डालकर खेलने में यकीन रखते थे, वहीं मुश्ताक फुल एंटरटेनर थे और यही उनके बेहद लोकप्रिय होने का कारण रहा.
विदेश में शतक जड़ने वाले भारत के पहले क्रिकेटर मुश्ताक ने टेस्ट डेब्यू मुख्यत: बाएं हाथ के स्पिनर के तौर पर किया था और बैटिंग में 7वें क्रम पर उतरे थे. दिलावर हुसैन के चोटिल होने पर दूसरी पारी में वे ओपनर के तौर पर उतरे और फिर ज्यादातर इसी रोल में खेले. भारत के टी20 टूर्नामेंट को उनके ही नाम पर सैयद मुश्ताक अली टूर्नामेंट कहा जाता है. मुश्ताक की लोकप्रियता ऐसी थी कि दूसरे वर्ल्डवार के बाद ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ अनाधिकृत टेस्ट की टीम से उन्हें बाहर किए जाने पर सिलेक्शन कमेटी के खिलाफ जमकर नारेबाजी हुई थी. लोगों ने मुश्ताक के टीम में गैरमौजूदगी पर टेस्ट नहीं होने देने की धमकी दे डाली थी. लोगों के गुस्से को देखते हुए सिलेक्टर्स को बाद में मुश्ताक को टीम में स्थान देना पड़ा था. 11 टेस्ट में 32.21 के औसत से 612 रन (दो शतक) बनाने वाले मुश्ताक के नाम पर 226 फर्स्ट क्लास मैचों में 35.90 के औसत से 13213 रन (30 शतक) दर्ज हैं.
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दुर्रानी के टीम में न होने पर दर्शक हो गए थे नाराज
सलीम दुर्रानी ऐसे दूसरे क्रिकेटर रहे जिन्हें खेलता देखने के लिए मैदान में भीड़ उमड़ती थी. 60 और 70 के दशक में दुर्रानी ऑलराउंडर की हैसियत से भारत के लिए खेले. गठीले शरीर के खूबसूरत पठान दुर्रानी की फैन फॉलोइंग जबर्दस्त थी. जब वे बैटिंग के लिए मैदान पर पहुंचते थे तो ‘वी वांट सिक्सर’ की आवाज गूंजने लगती थी. ज्यादातर मौकों पर यह फरमाइश पूरी भी होती थी. स्टेडियम के जिस कोने से ‘सिक्सर’ के लिए आवाज आती, दुर्रानी उसी तरफ 6 लगाकर दिल जीत लेते थे. 11 सितंबर 1934 को अफगानिस्तान के काबुल में पैदा हुए सलीम दुर्रानी ने भारत के लिए 29 टेस्ट खेलकर 25.04 के औसत से 1202 रन बनाए जिसमें 1 शतक और 7 अर्धशतक थे. लेग स्पिन बॉलिंग से 75 विकेट भी उन्होंने लिए.
1972-73 में इंग्लैंड टीम के भारत दौरे का पांचवां टेस्ट मुंबई (तब बंबई) के ब्रेबोर्न स्टेडियम में होना था. कानपुर के चौथे टेस्ट में दुर्रानी प्लेइंग XI का हिस्सा नहीं थे. ऐसे में उनके फैंस ने मुंबई टेस्ट के लिए चयन न होने पर स्टेडियम पर ताला लगाने की धमकी दे डाली थी. फैंस के दबाव में बीसीसीआई ने दुर्रानी को इस मैच की प्लेइंग इलेवन में जगह दी और उम्मीदों पर खरा उतरते हुए बाएं हाथ के इस धाकड़ प्लेयर ने 73 रन की पारी खेली थी. दुर्भाग्यवश यही दुर्रानी का आखिरी टेस्ट रहा. दुर्रानी ने बॉलीवुड की कुछ फिल्मों में भी एक्टिंग की. पिछले साल ही उनका निधन हुआ है.
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कपिल को बाहर किए जाने पर गावस्कर से नाराज थे फैंंस
कपिल देव का नाम भारतीय क्रिकेट में किसी परिचय का मोहताज नहीं है. टेस्ट क्रिकेट में आठ शतक के साथ 5248 रन बनाने वाले कपिल ने 434 विकेट भी लिए, वनडे में एक शतक के साथ 3783 रन बनाने के अलावा 253 विकेट उनके नाम पर दर्ज हैं. अपनी बॉलिंग और बैटिंग से किसी भी मैच का रुख पलटने की क्षमता उनको खास बनाती थी. कपिल की कप्तानी में न सिर्फ भारत ने पहली बार वर्ल्डकप जीता बल्कि इसी दौर में टीम इंडिया ने दुनिया की धाकड़ टीमों को टक्कर देने तथा हराने की हिम्मत दिखाई. कपिल बेहतरीन बॉलर तो थे ही, ताबड़तोड़ बैटिंग से भी दर्शकों के दिलों पर राज करते थे. वर्ल्डकप 1983 में जिम्बाब्वे के खिलाफ नाबाद 175 रन की उनकी पारी अभी भी वनडे की सर्वश्रेष्ठ पारियों में शुमार की जाती है. कपिल फिटनेस कारणों से कभी टीम से बाहर नहीं हुए. हालांकि कथित गैरजिम्मेदाराना बैटिंंग के कारण उन्हें 1984-85 में एक टेस्ट से उन्हें बाहर होना पड़ा और वे लगातार 100 टेस्ट खेलने का रिकॉर्ड बनाने से वंचित रह गए. इस घटना के चलते भारतीय क्रिकेट के दो स्टार प्लेयर सुनील गावस्कर और कपिल के रिश्ते में कड़वाहट आ गई थी जिसे खत्म होने में काफी वक्त लगा.
1984-85 सीरीज के अंतर्गत मुंबई (तब बंबई) का पहला टेस्ट भारत ने 8 विकेट से जीता था. दिल्ली का दूसरा टेस्ट ड्रॉ होने के आसार थे. दूसरी पारी में भारत का स्कोर एक समय तीन विकेट पर 207 रन था लेकिन इसी स्कोर पर संदीप पाटिल (41) के रूप में चौथा विकेट गिरने के बाद टीम इंडिया ने कपिल देव (7) सहित अगले छह विकेट महज 28 रन जोड़कर गंवा दिए. भारतीय टीम 235 रन बनाकर आउट हो गई. मैच जीतने के लिए इंग्लैंड को 125 रन का टारगेट मिला जिसे टीम ने दो विकेट खोकर हासिल कर लिया था.
इसके बाद कोलकाता (तब कलकत्ता) के तीसरे टेस्ट की टीम से कपिल देव को बाहर कर दिया गया. कपिल के फैंस ने इसके लिए तत्कालीन कप्तान सुनील गावस्कर को जिम्मेदार माना था और ‘नो कपिल, नो टेस्ट’ का नारा बुलंद किया था. इस टेस्ट में गावस्कर की जबर्दस्त हूटिंग की गई जिससे नाराज होकर सनी ने कभी कोलकाता में नहीं खेलने का ऐलान किया था. सीरीज के चौथे टेस्ट में कपिल की टीम में वापसी हो गई लेकिन इस घटना ने कपिल-गावस्कर के बीच दूरी बढ़ा दी थी. इसके कई वर्षों बाद गावस्कर ने स्पष्ट किया था कि कपिल को कोलकाता टेस्ट से बाहर करने में उनका कोई हाथ नहीं था और यह पूरी तरह से सिलेक्टर का फैसला था.
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FIRST PUBLISHED : February 29, 2024, 10:06 IST