छोटी-सी दुकान के लिए छोड़ दी लाखों की नौकरी, धंधे में कैसी शर्म, इस लड़के से सीखो, संभाल रहा है पापा का कारोबार

Success Story: देश में पिछले 10 वर्षों में स्टार्टअप कल्चर के आने से हजारों युवा उद्यमी उभरे हैं. किसी ने नौकरी छोड़ी तो किसी ने शून्य से शुरू करके हजारों-करोड़ों का कारोबार खड़ा कर दिया. इनमें से कई युवा ऐसे रहे जिन्होंने नामी-गिरामी कंपनियों में लाखों की जॉब छोड़कर बिजनेस करने का रिस्क लिया. खास बात है कि इनमें से कई युवाओं ने बड़ी कामयाबी पाई और फ्लिपकार्ट, ओला, ओयो रुम्स जैसी कंपनियों को खड़ा कर दिया. खैर, हम आपको एक ऐसे युवा उद्यमी की कहानी बताने जा रहे हैं जिसने होटल बिजनेस के लिए नौकरी छोड़ दी. इंटरनेशन फर्म गोल्डमैन सैस में इन्वेस्टमेंट बैंकर रहा ये शख्स आज छोटी-सी दुकान पर इडली बेच रहा है. थोड़ी देर के लिए यह सुनकर आप हैरान हो सकते हैं लेकिन यह सच है.

ये कहानी बेंगलुरु अय्यर इडली वाले की है, जो विज्ञान नगर इलाके में काफी फेमस हैं. अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर इडली बेचने का फैसला इस युवा के लिए इतना आसान नहीं था लेकिन एक बड़ी वजह रही जिसके चलते कृष्णन महादेवन ने यह मुश्किल निर्णय लिया. आइये आपको बताते हैं इस युवा उद्यमी की सक्सेस स्टोरी.

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क्यों छोड़ी लाखों की नौकरी
कृष्णन महादेवन, इंटरनेशनल फाइनेंशियल फर्म, गोल्डमैन सेस में इन्वेस्टमेंट बैंकर के तौर पर नौकरी करते थे. लाखों रुपये के पैकेज वाली जॉब इस युवा ने इसलिए छोड़ दी, क्योंकि उसे अपने परिवार के व्यवसाय, अय्यर इडली को संभालना था. इस फर्म की स्थापना उनके पिता ने 2001 में की थी और उनका नाम स्वादिष्ट गर्म इडली के लिए प्रसिद्ध है. पिछले 20 वर्षों अय्यर इडली के स्वाद को लोगों ने खूब सराहा.

कृष्णन के पिता लगभग 19 वर्षों तक इडली को केवल नारियल की चटनी के साथ परोसते थे. कई रेस्तरां होने के बावजूद, अय्यर इडली अपने स्वाद के लिए बहुत लोकप्रिय है. महज 20 बाय 10 स्क्वायर फीट की यह दुकान पूरे शहर में बेहद फेमस है. कम कीमत में बेहतर स्वाद के लिए रोजाना बड़ी संख्या में लोग अय्यर इडली खाने आते हैं. इस दुकान पर हर महीने 50,000 से अधिक इडली बेची जाती है.

कृष्णन और उनकी मां, मिलकर अय्यर इडली की विरासत को संभाल रहे हैं. हाल ही में, उन्होंने ने वड़ा, केसरी भात और खारा भात, सभी दक्षिण भारतीय व्यंजनों को मेनू में शामिल किया है. खास बात है कि नौकरी लगने से पहले भी महादेवन कृष्णन दुकान पर काम करते थे और कॉलेज भी जाते थे. 2009 में जब उनके पिता का निधन हो गया, तो दुकान संभालने की जिम्मेदारी उन पर और उनकी मां पर आ गई.

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