विश्व के किसी भी लोकतांत्रिक देश में चुनाव के दौरान ऐसा अजूबा नहीं होता जैसा भारत में होता है। यहां आम तौर पर जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र के नाम पर वोट मांगे जाते हैं। भावना भड़काने और मतदाताओं को गुमराह करने के लिए इन मुद्दों का इस्तेमाल किया जाता है। यद्यपि ऐसा करना आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन है लेकिन फिर भी पार्टियां और उनके उम्मीदवार इसकी रंचमात्र भी परवाह न करते हुए इस तरह के मुद्दों को हवा देते हैं ताकि चुनाव जीत सकें। वर्षों से यही सिलसिला बेरोकटोक चला आ रहा है। राजनीतिक दलों के लिए यह मुद्दे सुविधाजनक हैं क्योंकि इनके जरिए जनता को भावनात्मक रूप से उत्तेजित कर आसानी से बहकाया जा सकता है।
कोई नहीं सोचता कि ऐसी बातों से चुनाव तो जीता जा सकता है लेकिन राष्ट्र की एकता-अखंडता को इससे गहरी क्षति पहुंचती है और पारस्पारिक विश्वास भी नष्ट होता है। इस मामले की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए निर्वाचन आयोग ने लोकसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दलों और उनके नेताओं से कहा है कि वे जाति, धर्म और भाषा के आधार पर वोट मांगने से परहेज करें। भक्त और भगवान के बीच के संबंधों का उपहास न उड़ाएं तथा दैवीय प्रकोप का हवाला न दें। चुनाव आयोग की यह चेतावनी तेलंगाना के बीजेपी सांसद अरविंद धर्मपुरी के उस बयान के बाद आई जिसमें उन्होंने मतदाताओं को धमकाया कि यदि वे मोदी सरकार की योजनाओं का लाभ लेने के बाद भी बीजेपी को वोट नहीं देंगे तो नर्क में जाएंगे। बीजेपी को वोट देने से लोगों को स्वर्ग मिलेगा।
व्यक्तिगत हमले से बचें
मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार ने पार्टियों व प्रत्याशियों को सलाह दी है कि व्यक्तिगत हमलों की बजाय विचारों को बढ़ावा दें तथा नैतिक और राजनीतिक विमर्श को आगे बढ़ाएं। मुद्दों पर आधारित बहस करें। पार्टियां व उनके नेताओं को तथ्यात्मक आधार के बिना बयान नहीं देना चाहिए और मतदाताओं को गुमराह नहीं करना चाहिए। मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर, गुरूद्वारे या किसी अन्य पूजास्थल का उपयोग चुनाव प्रचार के लिए नहीं करना चाहिए। मुख्य चुनाव आयुक्त ने अपनी ओर से हिदायत दे दी लेकिन बीजेपी के नेता-कार्यकर्ता बार-बार जनता को यही बता रहे हैं कि बीजेपी ने अयोध्या में राम मंदिर बनाने का अपना वादा पूरा कर दिखाया। हिंदुत्व की भावना पर जोर देकर ही बीजेपी चुनाव जीतती है।
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विकास के मुद्दे पर वोट नहीं मिलते
यद्यपि विकास का मुद्दा बहुत महत्वपूर्ण है लेकिन वह भावनाओं को उद्वेलित नहीं करता। इसीलिए नेता मंदिरों और तीर्थस्थलों की शरण में जाकर स्वयं को आस्थावान भक्त या साधक के रूप में पेश करते हैं। अच्छी सड़कें, पुल, बेहतर स्वास्थ्य सेवा, नल से जलापूर्ति, आवास निर्माण, शैक्षणिक सुविधा जैसी कितनी ही लोक कल्याणकारी योजनाओं के आधार पर वोट मांगे जा सकते हैं, फिर भी जाति और धर्म के मुद्दे जनमानस में गहराई से रचे-बसे हैं। इसी के आधार पर उम्मीदवार तय किए जाते हैं कि किस इलाके में किस जाति के वोटों का समीकरण कैसा है। लगभग 1 दशक पहले धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिकता को लेकर बहस हुआ करती थी लेकिन अब यह मुद्दा नदारद है। कुछ पार्टियां हार्ड तो कुछ सॉफ्ट हिंदुत्व की राह चल पड़ी हैं क्योंकि वोट लेने की जरूरत आन पड़ी है।
स्टार प्रचारकों को चेतावनी
चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों को चुनाव प्रचार में शिष्टाचार बनाए रखने और उन स्टार प्रचारकों व उम्मीदवारों को अतिरिक्त जिम्मेदार रहने की चेतावनी दी जिन्हें अतीत में नोटिस जारी किए गए थे। उनसे कहा गया कि बार-बार आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन करने पर उन्हें कड़ी कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा। जाहिर है कि आचार संहिता उल्लंघन के मामले में चुनाव आयोग कड़ी कार्रवाई करे तो पार्टियां व उम्मीदवार सुधरेंगे।